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Sunday, March 15, 2020

Munsi Premchand Biography | प्रेमचंद का जीवन परिचय

Munsi Premchand Biography | प्रेमचंद का जीवन परिचय



"कर्मभूमि मुंशी प्रेमचंद जी का  ख्याति प्राप्त उपन्यास है जो एक ओर यदि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की गंभीरता को उद्घाटित करता है, तो ओहि दूसरी ओर उसकी ब्यापकता का भी। इस प्रकार कर्मभूमि समग्ररूप से भारत के स्वाधीनता आंदोलन की झांकी है , जिससे तत्कालीन सामाजिक ,राजनैतिक ,धार्मिक एवंग आर्थिक स्तिथि तार -तार हो गयी है। "  ---डॉ शुक्ल जी 

Premchand
प्रेमचंद

जीवन परिचय 

         प्रेमचंद की अत्यंत गरीबी में अपने दिन में गुजारने पड़ी।  अपने सम्बन्ध में इन्होने लिखा है कि मैंने कभी 
बारह आने (12 Aane) से ज्यादा का जूता नहीं  पहना, आन्ध्ररा के पुल के चमारो का चमरौधा जूता बहुत दिनों तक पहना है और कभी चार आने (25 Paisa) गज़ से ज्यादा का कपड़ा नहीं खरीदा। 

        पिता की मृतुय के बाद इनके जीवन में अनेको कठिनाईया उत्पन्न हुई।  उस समय की अपनी दशा का वर्णन प्रेम चंद लिखते है की , जब पिता की मृतुय हुई तब , घर में मेरी इस्त्री थी , विमाता थी ,उनके दो बालक थे और आमदनी एक पैसे की भी नहीं थी ,फिर भी उनमे ऊपर उठाने की भावना थी।

      सन १९०५ में इन्होने शिवरानी नामक  विधवा से दुसरा विवाह किया। सन १९२० में असहयोग आंदोलन जोरो पर था। जालिया वाला बाग में नृसंस हत्या हो चुका था। इसी बीच  गाँधी जी का आगमन हुआ। उनसे आप इतने प्रभावित हुए की अपनी २० बरस पुरानी नौकरी से भी त्याग पत्र दे दिया और साहित्य सृजन की ओर अग्रसर हो चले। इस समय तक आप 'सेवा सदन' लिख चुके थे और ' प्रेमाश्रय' लिख रहे थे।

     सन १९२३ ई में साझीदारों ने मिलकर बनारस में '' सरस्वती प्रेस " की स्थापना की।  वह स्वेम गंगा पुस्तकमाला ,लखनऊ में आकर नौकर हो गए। सन १९२४ में महाराजा अलवर ने उन्हें ४०० रुपये महीने और मोटर बांग्ला मुफ्त पर अपने यहां बुलाया , पर उन्होंने यहां जाने से साफ़ मना कर दिया।  इस समय तक उनकी साहित्यकार के ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल चुकी थी।, सन १९३० में इन्होने हंस का सम्पादन किया और १९३१ में इनकी 'समर यात्रा ' प्रकाशित हुई।  इश्के अनन्तर इन्होने 'माधुरी' का भी संपादन किया।  इसी के बाद अर्थाभाव  कारन अपना पत्र 'जागरण ' बंद कर देना पड़ा।  आर्थिक बिसमता के कारन इन्हे सन १९३४ में 'फिल्मो ' में काम करना पड़ा किन्तु यहां साहित्य की छीछा लेदर देख कर इनका मन यहां नहीं रमा और फ़िल्मी जगत को तिलांजलि देकर वपर चले आये। वहां से वापिस आने के बाद सन १९३६ में 'गोदान' का प्रकाशन हुआ।  इसके अनन्तर इन्होने 'मंगल सूत्र ' नामक अपने बहुचर्चित उपन्यास का प्रणयन किया।  इसी समय प्रगतिशील लेखकों का एक मंच भी आपने स्थापित किया था।  सन १९३६ को ८ अक्टूबर को माँ भारतीय का यह अमर सपूत पञ्च तत्त्व में बिलिन हो गया , चन्द्रास्त हुआ  पर चन्द्रिका देदिप्यमान है और न जाने कब तक देदिप्यमान रहेगी।

ब्यक्तित्व -

       प्रेम चन्द का ब्यक्तित्व सरल और सादा था। दुबले शरीर ,दीर्घ नेत्र एवं घनी सुगड़ मूछें जो बरबस किसी को अपनी तरफ आकर्षित करने में सछम थी। इनके ब्यक्तित्व का निरूपण करते हुए अमृतराय जी लिखते है की "वह सीधे सादे बेलौस मुहब्बती ब्यक्ति थे , जो भी ब्यक्ति उनके संपर्क में आये उनको प्रेमचंद का एहि रूप देखने को मिला होगा कही भी दुर्गारापन नहीं था सब जगह  एक था , झील के पानी की तरह पारदर्शक है ,यही इस बड़े आदमी की महानता थी की वह किसी तरह से महान नहीं था। 







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